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जया एकादशी - तारीख़, शुभ मुहूर्त, महत्व, व्रत कथा, पूजा-विधि

Shri Saswata S.|Sun - Feb 18, 2024|5 min read

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सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अंतर्गत प्रत्येक माह की 11वीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। एकादशी को भगवान विष्णु को समर्पित तिथि माना जाता है। एक महीने में दो पक्ष होने के कारण दो एकादशी होती हैं, एक शुक्ल पक्ष में तथा दूसरी कृष्ण पक्ष में। इस प्रकार एक वर्ष में 24 एकादशी होती हैं। अधिक मास की स्थति मे यह संख्या 26 हो जाती है।
हर वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी के अगले दिन जया एकादशी मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही भगवान विष्णु का सुमिरन किया जाता है। इस तिथि पर भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखा जाता है। शास्त्रों में एकादशी व्रत के पुण्य फल का वर्णन है। इस व्रत को करने से पूर्व जन्म के पापो से मुक्ति मिलती है साथ ही मृत्यु लोक में सभी प्रकार के सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है। 

जया एकादशी तारीख़ और शुभ मुहूर्त

इस वर्ष पंचांग के अनुसार, जया एकादशी तिथि की शुरुआत 19 फरवरी को सुबह 08 बजकर 49 मिनट से होगी और इसके अगले दिन यानी 20 फरवरी को सुबह 09 बजकर 55 मिनट पर तिथि समाप्त होगी।जया एकादशी का व्रत 20 फरवरी को रखा जाएगा।

जया एकादशी का महत्व

जया एकादशी के व्रत का विशेष महत्व है। इस व्रत के रखने से पापों का अंत होता है, मां लक्ष्मी का आपके घर में वास होता है और भगवान् विष्णु जी की कृपा प्राप्त होती है। जया एकादशी का व्रत करने से मृत्योपरांत भूत, प्रेत और पिशाच योनि की यातनाएं नहीं भुगतनी पड़ती हैं। इसीलिए इस व्रत को जरुर रखें और श्री हरि विष्णु जी की इस दिन विधिवत पूजा करें। मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति चाहते हैं तो इस दिन व्रत को पूरे नियम के साथ रखें। भगवान विष्णु जो जगत के पालन हार हैं - अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। इसीलिए इस व्रत के महत्व को समझें और रखें।

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व्रत कथा

एक बार देवराज इंद्र की सभा में उत्सव मनाया जा रहा था। इस उत्सव सभा में गंधर्वों का गायन चल रहा था और गंधर्व-कन्याओं का नृत्य हो रहा था। इसी बीच माल्यवान नामक गन्धर्व का गायन शुरू हुआ और साथ में पुष्पवती नामक गन्धर्व-कन्या का नृत्य शुरू हुआ। जैसे ही पुष्पवती की नज़र माल्यवान पर पड़ती है तो पुष्पवती माल्यवान की ओर आकर्षित हो जाती है। इस वजह से पुष्पवती सभा की मर्यादा को भूलकर माल्यवान को आकर्षित करने के लिए नृत्य करने लगती है। पुष्पवती के इस प्रकार नृत्य करने से माल्यवान पुष्पवती की ओर आकर्षित हो जाता है और इसी कारण से वह सुर-ताल से भटक जाता है। यह देख कर देवराज इंद्र माल्यवान और पुष्पवती को सभा की मर्यादा भंग करने के लिए श्राप दे देते हैं। देवराज इंद्र दोनों को स्वर्ग से वंचित होकर मृत्यु लोक (पृथ्वी) में पिशाच योनि में जीवन व्यतीत करने का श्राप देते हैं। जब वे पृथ्वी लोक में पिशाच योनि में जन्म लेते हैं तो वे दोनों हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष के ऊपर रहना शुरू कर देते हैं। पिशाच योनि में दोनों का जीवन अत्यंत कष्टदायी था और वे विवशतापूर्वक दुखी मन से अपने दिन व्यतीत कर रहे थे। ऐसे ही समय बीतता गया और एक दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन आया। अपनी ऐसी दयनीय स्थिति से दुखी होकर दोनों इस दिन फलाहार ही करते हैं। रात्रि के समय कड़ाके की ठण्ड पड़ती है और इस वजह से दोनों पूरी रात जगे रहते हैं। सुबह तक ठण्ड में ठिठुरने की वजह से दोनों की मृत्यु हो जाती है। इस कारण अनजाने में ही दोनों का जया एकादशी का व्रत पूर्ण हो जाता है और दोनों की पिशाच योनि से मुक्ति हो जाती है। इसके बाद दोनों फिर से स्वर्ग में वास करने लगते हैं। दोनों को स्वर्ग में देख कर देवराज इंद्र ने हैरान होकर दोनों से पिशाच योनि से मुक्ति मिलने का रहस्य पूछा। इस पर दोनों ने सारी बात इंद्रदेव को बताई और कहा कि यह कृपा भगवान श्री विष्णु जी की भक्ति और जया एकादशी के व्रत का प्रभाव है। यह बात सुन कर देवराज इंद्र बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दोनों को स्वर्गलोक में ख़ुशी-ख़ुशी रहने का आशीर्वाद दिया।

 जया एकादशी को भीष्म एकादशी क्यों कहा जाता है?

भीष्म एकादशी का नाम महाकाव्य महाभारत के पात्र भीष्म के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने जीवन-पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा ली थी। पितामह भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था जिसके कारण वो अपनी मृत्यु का समय स्वयं निर्धारित कर सकते थे। अपने अंत समय में भीष्म पितामह ने जया एकादशी के पावन दिन को ही अपने प्राण त्यागने का निश्चय किया ताकि वो सीधे भगवन विष्णु के बैंकुंठ लोक को प्राप्त हो सकें। तभी से जया एकादशी को भीष्म एकादशी का नाम भी दिया गया।


जया एकादशी पूजा विधि

1.जया एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दिन की शुरुआत भगवान विष्णु के ध्यान से करें।
2.स्नान करने के बाद पीले रंग के वस्त्र पहने ।
3.अब मंदिर की साफ-सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव कर शुद्ध करें।
4.इसके बाद घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करें और साथ ही पुष्प, धूप-दीप, तुलसी , चंदन, मिष्ठान आदि चीजें अर्पित करें।
5.इसके बाद भगवान विष्णु के स्तोत्र का पाठ करें और व्रत कथा पढ़ें।
6.अंत में भगवान विष्णु की आरती कर भोग लगाएं।
7.इसके पश्चात लोगों में प्रसाद का वितरण करे।

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जया एकादशी पर विशेष पूजा

शत्रुओं को परास्त करने के लिए तिल के तेल के छह दीपक जलाएं। इस दिन विष्णु जी को सुपारी और लौंग अर्पित करें। बाद में मनोकामना पूरी करने के लिए इसे पैसों की तिजोरी में रख दें। आर्थिक तंगी दूर करने के लिए विष्णु जी को 12 बादाम चढ़ाएं। बाद में इन्हें एक कपड़े में लपेट कर घर में छिपाकर रखें।

विशेष मंत्र


चंदन माला से ऊँ नमो भगवते जगदीशाय मंत्र का जाप करें।
शास्त्रों के अनुसार, जया एकादशी के दिन, व्यक्ति को अपने मन में किसी के भी प्रति दुश्मनी का भाव रखने से बचना चाहिए और सच्चे ह्रदय से, पूरी आस्था और विश्वास के साथ भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। किसी भी समय शत्रुता, धोखे और वासना की भावनाएं मन में नहीं लानी चाहिए। इस अवधि में नारायण स्तोत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी काफी लाभकारी रहेगा। इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करने वालों पर माता लक्ष्मी और श्री हरि विष्णु की कृपा बरसती है।
इस ब्लॉग में हमने जया एकादशी के बारे में विस्तार से बताया है। अगर आपको यह ब्लॉग पसंद आया है तो अपने दोस्तों और परिवार जनों से इसे शेयर ज़रूर करे।

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