गीता गोविंद पाठ: जप का श्रेष्ठ समय, अर्थ व आध्यात्मिक लाभ
मंगल - 27 जन॰ 2026
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गीता गोविंद की रचना 12वीं शताब्दी के महान हिंदू कवि जयदेव ने की थी। यह ग्रंथ श्रीकृष्ण, राधा और वृंदावन की गोपियों के बीच दिव्य संबंध को दर्शाता है।
विषय सूची
- जयदेव और गीता गोविंद की रचना
- जगन्नाथ मंदिर परंपरा में गीता गोविंद
- गीता गोविंद का सार और आध्यात्मिक व्याख्या
- गीता गोविंद पाठ
- गीता गोविंद जप करने का श्रेष्ठ समय
- गीता गोविंद जप के लाभ

जयदेव और गीता गोविंद की रचना
गीता गोविंद को 12 अध्यायों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक अध्याय को आगे एक या अधिक प्रबंधों में विभाजित किया गया है, जिनकी कुल संख्या चौबीस है।
प्रत्येक प्रबंध में आठ-आठ पदों के समूह होते हैं, जिन्हें अष्टपदी कहा जाता है।
यह काव्य नायिका के आठ भावों का भी वर्णन करता है, जिन्हें अष्ट नायिका कहा जाता है। इन भावों ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की अनेक परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया है।
जगन्नाथ मंदिर परंपरा में गीता गोविंद
पवित्र जगन्नाथ मंदिर, पुरी में प्रतिदिन रात्रि के समय जयदेव द्वारा रचित गीता गोविंद का गायन ओडिसी संगीत शैली में किया जाता है। यह परंपरा स्वयं जयदेव के समय से चली आ रही है।
केरल के संगीतज्ञों ने अष्टपदियों को एक विशेष संगीत शैली में रूपांतरित किया, जिसे सोपान संगीत कहा जाता है, और इसे मंदिरों में गाया जाता है।
इसके अतिरिक्त, गुरु ग्रंथ साहिब में भी जयदेव के कई पद सम्मिलित हैं, जो उनकी सार्वभौमिक आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाते हैं।
गीता गोविंद का सार और आध्यात्मिक व्याख्या
गीता गोविंद में श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम, कृष्ण की विरक्ति (अननिष्ठा), और अंततः राधा के पास उनकी वापसी का वर्णन है।
इसे मानव आत्मा के प्रतीक रूप में देखा जाता है, जो सांसारिक मोह में अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाती है, लेकिन अंततः अपने सृजनकर्ता ईश्वर के पास लौट आती है।
गीता गोविंद पाठ
शृतकमलकुचमण्डल धृतकुण्डल
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥
दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे॥
कालियविषधरगंजन जनरंजन
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे॥
मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन
सुरकुलकेलिनिधान जय जय देव हरे॥
अमलकमलदललोचन भवमोचन
त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे॥
जनकसुताकृतभूषण जितदूषण
समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे॥
अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर
श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे॥
तव चरणे प्रणत वयमिति भावय
कुरु कुशलं वः प्रणतेषु जय जय देव हरे॥
श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं
कुरुते मृदु मंगलमंजुल गीतं जय जय देव हरे॥
राधे कृष्ण हरे गोविंद गोपाल
नंदजु को लाला यशोदा दुलाला जय जय देव हरे॥
गीता गोविंद जप करने का श्रेष्ठ समय
रात्रि काल
गीता गोविंद का जप किसी भी समय श्रद्धा से किया जा सकता है, लेकिन रात्रि के समय, विशेष रूप से सोते समय इसका जप अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
यह समय श्रीकृष्ण की रासलीला से जुड़ा हुआ है।
साथ ही, पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भी गीता गोविंद का गायन रात्रि में ही होता है।
ब्रह्म मुहूर्त
प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे तक का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है। इस समय मन शांत और शुद्ध होता है, अतः भक्त इस समय गीता गोविंद पाठ कर सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, जनमाष्टमी, राधाष्टमी और एकादशी जैसे वैष्णव पर्वों पर गीता गोविंद का जप अत्यंत शुभ माना गया है।
गीता गोविंद जप के लाभ
- वैवाहिक समस्याओं को दूर करता है और बिछड़े दंपतियों को पुनः मिलाता है
- योग्य जीवनसाथी प्राप्त करने में सहायता करता है
- प्रेम में सफलता प्रदान करता है और लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होता है
- टूटे हुए वैवाहिक संबंधों में प्रेम और सामंजस्य पुनः स्थापित करता है
- जीवनभर वैवाहिक सुख और स्थायी संबंध प्रदान करता है
- सभी संबंधों में आनंद, शांति, प्रेम और सौहार्द को बढ़ावा देता है
