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जया एकादशी 2026: तिथि, महत्व, व्रत कथा, पूजा विधि और लाभ

बुध - 01 फ़र॰ 2023

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सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत विशेष आध्यात्मिक महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक पक्ष की 11वीं तिथि को एकादशी कहा जाता है और यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। चूँकि प्रत्येक माह में दो पक्ष होते हैं—शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष—इसलिए हर महीने दो एकादशी आती हैं। इस प्रकार एक वर्ष में कुल 24 एकादशी होती हैं, जबकि अधिक मास होने पर इनकी संख्या 26 हो जाती है।

जया एकादशी प्रतिवर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी के अगले दिन मनाई जाती है। इस पावन दिन भक्तगण भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं और निरंतर उनके नाम का स्मरण करते हैं। भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए इस दिन व्रत रखा जाता है। शास्त्रों में एकादशी व्रत के महान पुण्य फल का वर्णन किया गया है। यह व्रत पूर्व जन्मों के पापों से मुक्ति दिलाने वाला तथा मनुष्य को इस लोक में समस्त सांसारिक सुख प्रदान करने वाला माना गया है।


विषय सूची

  • जया एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त
  • जया एकादशी का महत्व
  • जया एकादशी व्रत कथा
  • जया एकादशी को भीष्म एकादशी क्यों कहा जाता है?
  • जया एकादशी पूजा विधि
  • विशेष अनुष्ठान और उपाय
  • विशेष मंत्र

जया एकादशी 2026: तिथि, महत्व, व्रत कथा, पूजा विधि और लाभ - Utsav App

जया एकादशी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, जया एकादशी की एकादशी तिथि का आरंभ बुधवार, 28 जनवरी को दोपहर 02:35 बजे होगा और इसका समापन गुरुवार, 29 जनवरी को सुबह 11:55 बजे होगा। उदया तिथि के अनुसार जया एकादशी का व्रत गुरुवार, 29 जनवरी 2026 को रखा जाएगा।

जया एकादशी का महत्व

जया एकादशी व्रत का अत्यंत विशेष महत्व है। इस व्रत को करने से संचित पापों का नाश होता है, माता लक्ष्मी का घर में वास होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत करता है, उसे मृत्यु के पश्चात भूत, प्रेत, पिशाच अथवा अन्य नकारात्मक योनियों में कष्ट नहीं भोगना पड़ता।

जो भक्त मोक्ष की प्राप्ति की कामना करते हैं, उन्हें इस दिन पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ व्रत अवश्य रखना चाहिए। भगवान विष्णु, जो इस सृष्टि के पालनकर्ता हैं, अपने सच्चे भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं।

जया एकादशी व्रत कथा

एक बार देवराज इंद्र की सभा में एक भव्य उत्सव का आयोजन किया गया था। सभा में गंधर्वों का मधुर गायन हो रहा था और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। इसी दौरान माल्यवान नामक एक गंधर्व गायन कर रहा था और पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या नृत्य कर रही थी।

नृत्य के समय पुष्पवती की दृष्टि माल्यवान पर पड़ी और वह उसकी ओर आकृष्ट हो गई। वह सभा की मर्यादा भूलकर ऐसे भाव प्रकट करने लगी, जिससे माल्यवान का मन विचलित हो गया और उसका गायन सुर-ताल से भटक गया।

यह देखकर देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने दोनों को स्वर्ग से निष्कासित कर पृथ्वी लोक में पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। पृथ्वी पर दोनों हिमालय पर्वत क्षेत्र में एक वृक्ष पर निवास करने लगे। पिशाच योनि में उनका जीवन अत्यंत कष्टमय था और वे विवशता में दुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे।

समय बीतता गया और एक दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आ गई। अपनी दयनीय स्थिति के कारण उस दिन उन्होंने केवल फलाहार किया। रात्रि में अत्यधिक ठंड के कारण वे पूरी रात जागते रहे। प्रातःकाल तक ठंड से पीड़ित होकर दोनों की मृत्यु हो गई।

अनजाने में ही उनका जया एकादशी व्रत पूर्ण हो गया, जिसके फलस्वरूप उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई और वे पुनः स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

जब देवराज इंद्र ने उन्हें फिर से स्वर्ग में देखा तो आश्चर्यचकित होकर मुक्ति का कारण पूछा। तब दोनों ने बताया कि यह सब भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी व्रत के पुण्य का फल है। यह सुनकर इंद्रदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने दोनों को सुखपूर्वक स्वर्ग में रहने का आशीर्वाद दिया।

जया एकादशी को भीष्म एकादशी क्यों कहा जाता है?

जया एकादशी को भीष्म एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इसका संबंध महाभारत के महान पात्र भीष्म पितामह से है। भीष्म पितामह ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने का संकल्प लिया था और उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था।

उन्होंने अपने शरीर का त्याग जया एकादशी के पावन दिन करने का निश्चय किया, ताकि वे सीधे भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम को प्राप्त कर सकें। तभी से जया एकादशी को भीष्म एकादशी भी कहा जाने लगा।

जया एकादशी पूजा विधि

जया एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान विष्णु का ध्यान करें। स्नान के पश्चात पीले रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की स्वच्छता करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें।

इसके बाद घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करें। उन्हें पुष्प, धूप, दीप, तुलसी पत्र, चंदन, मिष्ठान आदि अर्पित करें। विष्णु स्तोत्रों का पाठ करें और एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें। अंत में भगवान की आरती करें, भोग अर्पित करें और प्रसाद का वितरण करें।

विशेष अनुष्ठान और उपाय

शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए तिल के तेल के छह दीपक जलाकर भगवान विष्णु को सुपारी और लौंग अर्पित करें। बाद में इन्हें अपनी धन तिजोरी में सुरक्षित रखें।

आर्थिक तंगी दूर करने के लिए भगवान विष्णु को 12 बादाम अर्पित करें और बाद में उन्हें कपड़े में बांधकर घर में सुरक्षित स्थान पर रखें।

विशेष मंत्र

चंदन की माला से निम्न मंत्र का जाप करें:

“ॐ नमो भगवते जगदीशाय”

शास्त्रों के अनुसार, जया एकादशी के दिन मन में किसी के प्रति द्वेष, शत्रुता या नकारात्मक भाव नहीं रखने चाहिए। पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और शुद्ध हृदय से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस दिन नारायण स्तोत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ अत्यंत लाभकारी माना गया है।

जो भक्त इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करते हैं, उन पर माता लक्ष्मी और भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा सदैव बनी रहती है।

इस ब्लॉग में हमने जया एकादशी के विषय में विस्तार से जानकारी दी है। यदि आपको यह लेख पसंद आया हो, तो कृपया इसे अपने मित्रों और परिवारजनों के साथ अवश्य साझा करें।







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