गणेश चतुर्थी : गणपति बप्पा के आगमन का इतिहास और महत्व
शनि - 16 सित॰ 2023
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गणेश चतुर्थी एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो भगवान गणेश के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। इन्हें "विघ्नहर्ता" और "सुखकर्ता" के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि भगवान गणेश के आगमन से सभी बाधाएं दूर हो जाते हैं। किसी भी अन्य पूजा से पहले भगवान गणेश की पूजा करना महत्वपूर्ण है, जैसा कि भारतीय पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि उनके आशीर्वाद के बिना कोई भी काम पूरा नहीं हो सकता। यह त्योहार १० दिन तक मनाया जाता है। फिर दसवें दिन उनका विसर्जन किया जाता हैं। इस वर्ष यह त्योहार १९ सितंबर से मनाया जाएगा। उनके भक्त दस दिन तक यह त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाते है। उनका अश्रुपूरित विसर्जन २८ सितंबर को किया जाएगा। आइये हम उनकी जन्म कथा के बारे में जानते हैं|
भगवान गणेश की जन्म कथा:
ऐसे तो गणेश जन्म की कई कथाएँ प्रचलित है। लेकिन शिवपुराण के अनुसार एक दिन, माता पार्वती ने अपने शरीर की मिट्टी से एक छोटी सी मूर्ति बनाई और उसमें प्राण डाल दिये। इस प्रकार भगवान गणेश का जन्म हुआ। इसके बाद, माता पार्वती स्नान करने के लिए आगे बढ़ीं और गणपति को दरवाजे के पास ही रहने का निर्देश दिया, और किसी को भी प्रवेश करने से रोक देने को कहा।
थोड़ी देर बाद भगवान शिव आये और बोले कि उन्हें माता पार्वती से मिलना है। हालाँकि, भगवान गणेश, जिन्होंने द्वारपाल की भूमिका निभाई थी, उन्होंने शिवजी के प्रवेश को रोक दिया। परिणामस्वरूप, भगवान शिव और भगवान गणेश के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, लेकिन कोई भी विजयी नहीं हो सका। क्रोध में आकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस त्रासदी को जानकर माता पार्वती फूट-फूट कर रोने लगीं और आत्म-विनाश के बारे में सोचने लगीं। उनकी प्रतिक्रिया से देवता भयभीत हो गए और उन्होंने स्तुति के माध्यम से उसे सांत्वना देने का प्रयास किया।फिर माता पार्वती का विलाप और देवताओं की विनती सुनकर भगवान शिव ने गरुड़ को उत्तर की ओर यात्रा करने और उस बच्चे का सिर लाने का निर्देश दिया जो मॉं अपने बच्चे की ओर पीठ करके सो रही थी। बहुत समय तक गरुड़ को कोई नहीं मिल सका। आख़िरकार एक हथिनी दिखाई दीं जो अपने बच्चे को पीठ देकर सो रही थी। फलस्वरूप गरुड़ जी हाथी के बच्चे का सिर काटकर ले आये। भगवान शिव ने हाथी के शरीर पर उसका सिर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। हाथी को फिर से जीवित देखकर माता पार्वती बहुत प्रसन्न हुईं और सभी देवताओं ने बालक गणेश को अपना आशीर्वाद दिया।
प्रथम पूज्य होने का वरदान:
भगवान शिव ने भगवान गणेश को अपने सभी अनुयायियों का अध्यक्ष घोषित करके आशीर्वाद दिया, और यह सुनिश्चित किया कि गणेश पूजा से शुरू होने वाला कोई भी शुभकार्य सफल होगा। इसके अतिरिक्त, भगवान शिव ने घोषणा की कि बाधाओं पर काबू पाने में भगवान गणेश का नाम प्रमुख होगा। इसलिए,भगवान गणेश को विघ्नहर्ता के रूप में भी जाना जाता है। और उनका सर्वप्रथम पूजन किया जाता हैं।
विभिन्न राज्यों में विभिन्न रूप में पूजन:
गणेश की मूर्तियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बनाई जाती हैं, प्रत्येक की अलग-अलग मुद्राएँ, पोशाकें और रूप होते हैं। देश के उत्तरी हिस्से में, विगति मूर्तियाँ प्रमुख हैं, जबकि पश्चिमी भारत अपनी आशीर्वाद देने वाली गणेश मूर्तियों के लिए जाना जाता है, और दक्षिण में सुंदर विगति मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं। गणेश चतुर्थी का उत्सव भी पूरे भारत में अलग-अलग होता है, भक्त विभिन्न स्थानों पर अपनी पूजा का आयोजन करते हैं जैसे कि महाराष्ट्र में गणपति बप्पा की महाराज और दिल्ली में लालबागचा राजा, इत्यादि। इस दिन लोग भगवान गणेश की पूजा करते हैं और उन्हें मोदक, लड्डू और फल चढ़ाते हैं। भगवान का सम्मान करने के लिए विशेष अनुष्ठान, आरती और भजन किए जाते हैं।
गणेश चतुर्थी के दिन व्रत का महत्व:
गणेश चतुर्थी के दिन व्रत का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत का अर्थ होता है कि भक्त अपने मन, शरीर और आत्मा को पवित्र कर के गणेश जी की अराधना करते हैं। यह व्रत अपनी श्रध्दा अनुसार रख सकते हैं परंतु साकार उपवास वो हैं जिसमें व्रती केवल फल और संबंधित आहार का सेवन करते हैं और निराकार उपवास जिसमें व्रती निराहार रहते हैं और केवल पानी पीते हैं।
इस उपवास से गणेश जी की विशेष कृपा प्राप्त होती हैं।
गणेश स्थापना की विधि:
सबसे पहले, एक साफ़ और सुथरी जगह तैयार करें जहां आप गणेश जी की मूर्ति स्थापित करेंगे। अब मूर्ति की स्थापना करने से पहले गणेश जी का आवाहन करें। आवाहन के लिए मंत्रोच्चारण के साथ उनका मन में स्मरण करें। फिर उन्हें स्थापित करें और उनकी आरती करें। गणेश जी को प्रसाद के रूप में मिठाई, फल, और नैवेद्य चढ़ाएं।
इन दस दिन में प्रतिबंधित कार्य:
गणेश चतुर्थी के दस दिन के दौरान गणेश भक्तों को मॉंस का सेवन, अशुभ कार्यों जैसे कि कब्रिस्तान जाना, श्रापित स्थलों का दर्शन और अशुभ भाषा का उपयोग और सेवन न करें।
किस रंग के वस्त्र पहनें:
गणेश चतुर्थी के दौरान कुछ विशेष रंगों के वस्त्र पहनने का मान्यता है जैसे की लाल वस्त्र गणेश जी को अत्यंत प्रिय है यह रंग आत्मा के ऊर्जा को बढ़ावा देता है। पीले वस्त्र शुभता का प्रतीक माना जाता हैं, इन्हें भी पहना जा सकता है। हरा और केसरिया रंग भी प्राकृतिक और प्रेम का प्रतीक माना जाता हैं। आप इन में से रंग का चुनाव कर सकते है। परंतु ध्यान दें कि मुख्य बात यह है कि आप अपने दिल से और आदर से गणेश जी का पूजन करें।
भगवान गणेश के महामंत्र:
कुछ ऐसे मंत्र जिनका जाप करके शुभ फल प्राप्त कर सकते हैं वो मंत्र है -
ॐ गं गणपतये नमः, ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभा, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा, ॐ गणेशाय नमः, ॐ एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंति प्रचोदयात्।
इन दिनों इनका जाप करने से भगवान गणेश से विशेष फल प्राप्त होता है।
गणेश चतुर्थी और गणेश जयंती में अंतर:
गणेश जयंती और गणेश चतुर्थी की तिथि का अंतर होता है। गणेश जयंती भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है, जबकि गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है।गणेश जयंती गणेश जी के जन्म के अवसर पर मनाई जाती है, जबकि गणेश चतुर्थी उनके आगमन के अवसर पर मनाई जाती है। गणेश जयंती पर व्रत नहीं रखा जाता हैं परंतु गणेश चतुर्थी के दिन व्रत रखा जाता हैं। ये दोनों अलग अलग पहलुओं को मनाते हैं।
गणेश चतुर्थी के साथ जुड़े रीति-रिवाज़:
घरों और व्यावसायिक स्थल पर गणेश जी की मुर्ति स्थापित की जाती हैं । गणेश पूजा और आरती का आयोजन किया जाता है। पूजा में फूल, धूप, दीपक, फल, और मिठाई भगवान गणेश को अर्पित किए जाते हैं। गणेश मंत्रों का जाप किया जाता है।गणेश चतुर्थी के अंत में मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। इसके लिए मूर्ति नदी, समुंदर, या अन्य जल स्रोत में डाली जाती है, जिसे गणेश विसर्जन कहा जाता है।कुछ स्थलों पर गणेश चतुर्थी के पर्व के दौरान सामाजिक सेवा का कार्य किया जाता है, जैसे कि फ्री मेडिकल कैम्प्स, आदर्श शिक्षा, और अन्य सामाजिक कार्य।
हम आपको और आपके परिवार को गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं देते हैं, और यह कामना करते हैं कि भगवान गणेश आपके जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता लाएं। जय श्री गणेश ।
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