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शीतला अष्टमी 2026: तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा, महत्व व वैज्ञानिक दृष्टिकोण

श्री सस्वता एस.|मंगल - 18 फ़र॰ 2025|6 मिनट पढ़ें

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शीतला अष्टमी जिसे बसोड़ा पूजा भी कहा जाता है (जिसका अर्थ है ‘पिछली रात का भोजन’), होली के बाद मनाई जाती है। होली रंगों का पवित्र हिन्दू पर्व है और इसके उपरांत आने वाली अष्टमी को शीतला माता की आराधना की जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार शीतला अष्टमी फाल्गुन या चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आती है। इस शुभ दिन भक्तजन शीतला माता की पूजा करते हैं, जिन्हें दुर्गा माता का अवतार माना जाता है।

विषय सूची

  1. शीतला अष्टमी 2026 की तिथि और समय
  2. शीतला अष्टमी का महत्व
  3. शीतला अष्टमी के अनुष्ठान और परंपराएँ
  4. विभिन्न क्षेत्रों में शीतला अष्टमी का उत्सव
  5. शीतला अष्टमी का वैज्ञानिक महत्व
  6. शीतला अष्टमी से जुड़ी कथा

शीतला अष्टमी पूजा विधिशीतला अष्टमी 2026: तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा, महत्व व वैज्ञानिक दृष्टिकोण - Utsav Appशीतला अष्टमी 2026 की तिथि और समय

वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी बुधवार, 11 मार्च को मनाई जाएगी।

पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 06 बजकर 36 मिनट से सायं 06 बजकर 27 मिनट तक रहेगा, जिसकी कुल अवधि 11 घंटे 51 मिनट होगी।

अष्टमी तिथि का आरंभ 11 मार्च 2026 को प्रातः 01 बजकर 54 मिनट पर होगा तथा अष्टमी तिथि का समापन 12 मार्च 2026 को प्रातः 04 बजकर 19 मिनट पर होगा।

शीतला अष्टमी का महत्व

मान्यता है कि माता दुर्गा अपने शीतला स्वरूप में भक्तों को चेचक, खसरा, चिकनपॉक्स तथा अन्य गर्मी से उत्पन्न रोगों से रक्षा करती हैं। शीतला माता की प्रतिमाओं में उन्हें दो या चार भुजाओं के साथ दर्शाया जाता है।

चार भुजाओं वाले स्वरूप में माता के हाथों में झाड़ू, नीम की पत्तियाँ, पंखा और जल से भरा कलश होता है। दो भुजाओं वाले स्वरूप में माता एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में गंगाजल से भरा कलश धारण करती हैं। झाड़ू रोगाणुओं और अशुद्धियों को दूर करने का प्रतीक है, जबकि कलश शुद्धता और स्वास्थ्य का संकेत देता है।

माता का वाहन गधा है। वे अपने भक्तों को रोगों और कष्टों से दूर रखकर स्वास्थ्य और सुख प्रदान करती हैं। इस दिन परंपरा के अनुसार घर में अग्नि प्रज्वलित नहीं की जाती और एक दिन पूर्व तैयार किया गया भोजन ही ग्रहण किया जाता है। सप्तमी तिथि को चावल और गुड़ या गन्ने के रस से विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है जिसे माता को नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है।

शीतला अष्टमी के अनुष्ठान और परंपराएँ

 1.बासी भोजन

शीतला अष्टमी की सबसे विशेष परंपरा बासी भोजन करना है। इस दिन भोजन पकाना वर्जित माना जाता है। श्रद्धालु एक दिन पूर्व तैयार किया गया शीतल और स्वच्छ भोजन ग्रहण करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह परंपरा गर्मी से होने वाले रोगों से रक्षा करती है।

2. शीतला माता की पूजा

भक्तजन शीतला माता के मंदिर में जाकर हल्दी, मेहंदी, सिंदूर, पुष्प और प्रसाद अर्पित करते हैं।

3. व्रत का पालन

कई भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और शीतला माता की कथा का श्रवण या पाठ करते हैं।

4. गंगाजल का छिड़काव

घर में गंगाजल का छिड़काव करने से वातावरण शुद्ध होता है और रोगों से रक्षा होती है, ऐसी मान्यता है।

विभिन्न क्षेत्रों में शीतला अष्टमी का उत्सव

भारत के अलग-अलग राज्यों में शीतला अष्टमी विभिन्न रीति-रिवाजों के साथ मनाई जाती है।

राजस्थान और गुजरात में महिलाएँ विशेष बासी भोजन बनाकर शीतला माता के मंदिरों में जाती हैं। कई स्थानों पर मेले और शोभायात्राएँ आयोजित की जाती हैं।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में घरों में विस्तृत पूजा की जाती है तथा दही, पूरी और रबड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में इस पर्व को Oladevi देवी की आराधना से जोड़ा जाता है, जिन्हें शीतला माता का एक रूप माना जाता है।

महाराष्ट्र में कुछ समुदाय जल और तुलसी पत्र अर्पित कर पारंपरिक भोजन के साथ पूजा करते हैं।

दक्षिण भारत में माता की पूजा Mariamman और Poleramma के रूप में की जाती है।

शीतला अष्टमी का वैज्ञानिक महत्व

शीतला अष्टमी का व्रत केवल धार्मिक नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस दिन बासी भोजन खाने की परंपरा स्वच्छता पर विशेष बल देती है। भोजन शीतल और स्वच्छ होना चाहिए।

माता के गले में नीम की माला दर्शाई जाती है। नीम में प्राकृतिक रोगाणुरोधी गुण होते हैं जो संक्रमण से बचाव में सहायक होते हैं। झाड़ू स्वच्छता का प्रतीक है और कलश में भरा शुद्ध जल स्वास्थ्य और पवित्रता का संकेत देता है।

इस प्रकार यह पर्व स्वच्छता, स्वास्थ्य और रोगों की रोकथाम का संदेश देता है।

शीतला अष्टमी से जुड़ी कथा

शीतला अष्टमी से संबंधित अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार शुबकेतु नामक एक धर्मात्मा और दानवीर राजा थे जिनकी पुत्री का नाम शेनहलता था। राजा शीतला माता के परम भक्त थे और प्रतिवर्ष बड़े श्रद्धा भाव से शीतला अष्टमी का उत्सव मनाते थे।

समय आने पर शेनहलता का विवाह प्रियव्रत नामक राजकुमार से हुआ। एक बार वह शीतला अष्टमी के अवसर पर अपने मायके आई और राजपरंपरा के अनुसार पूजा में सम्मिलित हुई। पूजा के पश्चात वह अपनी सखियों के साथ वन के समीप स्थित सरोवर की ओर गई, परंतु वे मार्ग भूल गईं।

उसी समय शीतला माता वृद्धा स्त्री का रूप धारण कर प्रकट हुईं और उन्हें सरोवर तक पहुँचाया। माता ने उन्हें विधिपूर्वक पूजा करने में भी सहायता की। यह कथा माता की करुणा और संरक्षण की भावना को दर्शाती है।

शीतला अष्टमी पूजा विधि

शीतला अष्टमी का पर्व ग्रीष्म ऋतु के आरंभ में मनाया जाता है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में यह विशेष रूप से मनाया जाता है।

प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर ठंडे जल से स्नान करें। इसके पश्चात शीतला माता के मंदिर जाकर पूजा करें।

गेहूँ के आटे से दीपक बनाकर अर्पित करें, परंतु उसे प्रज्वलित न करें।

इसके बाद मेहंदी, हल्दी, सिंदूर, पुष्प, पान, सुपारी, नारियल, मुद्रा, मिठाई और केले अर्पित करें।

एक दिन पूर्व तैयार भोजन की थाली सजाकर अर्पित करें और कलश में जल भरें।

मंत्रोच्चारण करते हुए माता से आशीर्वाद की प्रार्थना करें। आरती करके पुष्प अर्पित करें और प्रसाद सभी परिवारजनों में वितरित करें।

इस दिन ताजा भोजन नहीं बनाया जाता और केवल अर्पित प्रसाद ही ग्रहण किया जाता है।

शीतला अष्टमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, स्वास्थ्य और संयम का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। माता शीतला सभी भक्तों को उत्तम स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि प्रदान करें।



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